तू हैं , कहीं  तो हैं 

तू हैं , कहीं  तो हैं 

तू जीत था ,  तू हार हैं 

तू उजाला था , तू अंधकार हैं 

तू किनारा था , तू मझधार हैं 

तू हैं   , कहीं  तो हैं  ।

कभी ख्वाब था तू , अब याद हैं 

कभी उम्मीद था तू , अब एहसास हैं  

तू सुबह की लाली था , तू सांझ की बाती हैं 

तू हैं  , कहीं तो हैं ।

ओंठो पर ठहरता था तू , आँखो मे रुका हैं 

ख्यालो मे था तू , भुलाने की कोशिशो मे हैं 

हर  लम्हा पास था तू , वक्त की तस्वीरों मे हैं 

तू हैं   , कहीं  तो हैं  ।

मेरा न सही मुझमें तो है

तू हैं   , कहीं  तो हैं ……..

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तोहफ़ा 

न खता हैं तेरी , ये लकीरें हैं मेरी

खुद ही न जान पायी कब हो गयी थी तेरी

याद आयी फिर वो बातें,

भूल जाती जिन्हे अगर हो जाती जिन्दगी अधूरी ।

अरमान होते भी तो न जान पाती

मर्जी तो दूर आंसुओ को भी न समझ पाती

दिन के उजाले से रातें खूबसूरत,

सवालो को पूछते कोई निगाहें नही होती ।

दोस्ती थी , आशिकी थी या दिल्लगी ,

न जान पायी न पहचान पायी

जब तक रंग पाती तुझे अपने रंग मे ,

किसी और के ही रंग मे रंग के हो गयी उसकी ।

अश्कों  को तो देखा तेरे  ,

पर उन्हे  मैं न रोक पायी

अब समझा इन आंसुओ को तो ,

रब से इन आंसुओ का तोहफ़ा मांग  ।

Fortnight Friday Fables #3 – http://wp.me/p8sTEi-11d

सवाल 

ख्वाब आँखो मे और वो आँखे , खिड़की से झांकती हुई ,

उस ओर की दुनिया की खातिर तरसती हुई ;

रस्ते पर वो भी होता ,

जहाँ थी कुछ आँखे सतरंगी ख्वाबो से भरी ,

और ,

उनकी जिन्दगी भी थी उसके सपनो का हिस्सा और अपनी ख़री ;

इस बचपन ने भी ये शाजिश रची ,

कहीं दुख का नामोनिशान नही 

उसकी निगाहें खुशी की खातिर तरसी ;

बचपन के वो नायाब खिलौने भी रोए होंगे ,

जब एक ने खुशियों की खातिर उन्हे खरीदे

और दूजे ने पेट की खातिर उन्हे बेचे होंगे ;

खिड़की के ओर होंगे कई सवाल ,

जवाब की खातिर जिनके शायद रब भी न हो तैयार ।

P.C.- google 

माँ

शब्दो मे पिरोने की नाकाम कोशिश 

P.C.- google 

पहला आंसु पोंछा , पहली मुस्कान साझा किया ,
जिंदगी भी तुने ही दिया और इसका मकसद भी तूने ही दिया

आंखो के आंसुओ को समेट कर मुझे हँसना सिखाया ,

दूसरो के लिए भी जीने के काबिल बनाया ;

हर दुख का सहारा , हर खुशी की साथी बन गई ,

हर जीत की दर्शक , हर हार मे ताकत बन गई ;

तेरे साथ से हर रस्ते आसान बन गए ,

तेरे आशीर्वाद से हर असफलता सफलता बन गए ;

सब सिखाया तूने फिर भी इस दुनिया मे जीना न सिखा पाई ,

जहाँ हर तरफ हैं बस स्वार्थ की लड़ाई, 

तुने हर दुख से मुझे इस कदर बचाया ,

इस वास्तविकता का साया भी न पड़ने पाया ;

कहते हैं कि ये जिंदगी भगवान की देन ,

और खुशियाँ उसकी मेहरबानी, 

तो तू मेरी भगवान, 

और मेरी खुशियाँ तेरी मेहरबान; 

तू वो हैं ,

जिसके लिए भगवान  भी तरसता हैं ,

तू उसकी सबसे अनूठी रचना हैं ;

तू इन्द्रधनुष और तू ही आकाश हैं, 

 तू माँ है ।

Fortnight Friday Fables #2 – http://wp.me/p8sTEi-Wz

वो…..

मुझसे ज्यादा खुद रोई मेरे पहले दर्द पे ,

फिर सिलसिला चलता आया वर्षो से 

हर दर्द को समेट मुस्कराती है ,

बेइंतहा मोहब्बत मुझ पर लुटाती है 

जीत मेरी , ईनाम उसका 

नाम मेरा , स्वाभिमान उसका 

मेरी खुशियाँ , उम्मीद उसके 

मेरी हँसी जिन्दगी उसकी ;

मुझको अपने जीने की आस बना लिया ,

मेरे अस्तित्व की खातिर खुद का वजूद मिटा लिया ;

डरती थी तुझे खोने के ख्याल से भी ,

चाहती थी जीना तेरे सामने ही ,

पर ,

तू क्या जी पाती मेरे जाने के बाद? 

देह रह जाती जिन्दगी खोने के बाद ;

छोड़ दिया उन ख्यालों को जो कर देते थे इतना बेचैन, 

अब तो बस इन आँखो का सपना हैं तेरे सुख-चैन ।

बहुत सी बातें तुझसे कहकर नही पाती ,

और बिन कहे रह भी न पाती ;

याद है जब पहली बार हुए थे अलग ?

रोए थे दोनो अलग-अलग, 

मेरे विश्वास की खातिर तू हँस रही थी ,

और उस हँसी की खातिर मैं, 

 कितना समेट लिया खुद को मेरी खुशियो के लिए ,

फिर भी मेरे हर दर्द को जान लिया बिन कहे ;

हर वक्त मे तेरा साथ मिला ,

हर जख्म पर तेरा एहसास मिला ;

अब तो लफ्ज भी कम पड़ने लगे 

“चन्द पंक्तिया तुझे क्या रचेगी” ,

ये भी अब कहने लगे ;

फिर भी इसका अन्त किए जा रही हूँ ,

इस रचना को एक नाम दिए जा रही हूँ ,

                    माँ ।

हर रोज वो जिए जा रही….

ख्वाबो को आँखो मे लिए हर रोज वो जिए जा रही ,

छोटी बड़ी तकलीफों को हँस के वो सहे जा रही….

आसमाँ मे उड़ान का सपना लिए ,

होंठो पर मुस्कान का सपना लिए ,

अपनी राह पर हर पल वो बढ़े जा रही ,

हर रोज वो जिए जा रही ।

माँ के सम्मान की खातिर, 

बाप के मुस्कान की खातिर, 

हर चुनौतियों का सामना वो किये जा रही ,

हर रोज वो जिए जा रही ।

कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह गई, 

कुछ नयी उम्मीदें मिल गई, 

एक नए आसमाँ मे वो उड़े जा रही ,

हर रोज वो जिए जा रही ।

आखिर कौन ?

ज़िन्दगी चली और यूं थम सी गई 

रुक कर एक सोच मे पड़ सी गई ।

जो चेहरा पहले खिलखिलाता था ,

जो दूसरो को जीना सिखाता था ,

वो आज खुद जीने की उम्मीद खोज रहा ।

जो पहले अंधेरे से डरती थी ,

आज इस रोशनी से छुप रही ।

दामन एक बार नोंचा एक दरिन्दे ने ,

रूह हर बार छलनी की इस समाज ने ।

बिना गलती के हर बार जो उसने सजा पायी ,

विश्वास  अपनो पर क्या खुद पर भी ना कर पायी ।

जिन आंसुओ का अस्तित्व भी न जाना था ,

आज वही उसका सहारा था ,

दूसरो के जख्मो को भी अपना समझने वाली ,

खुद को सम्भालने की हिम्मत भी न जुटा पाई ,

आसमाँ को पाने की ख्वाहिश रखती थी वो ,

आज गुमनामी की जिन्दगी मे खुद को समेट लिया ।

आखिर कौन  ?

किसकी ये भेंट है ?

वो जिसने सब शुरु किया 

या ये महफिल? 

अंजाम जिसने कभी आने ही न दिया ,

बस दिया तो गुमनाम जिन्दगी 

भूल कर उस दरिन्दगी को , 

कर सकती थी एक नई शुरुआत, 

पर दुनिया की दरिन्दे न भूल पायी , जिसने

उसे ये मौका ही ना दिया ।

ये दुनिया अब उसे भुला चुकी ,

दोबारा एक और कहानी पा चुकी ,

बदले है तो 

बस नाम और चेहरे ।

किस्सा वही दोहराया जायेगा ,

जब तक कोई अपना उस जिन्दगी को न पायेगा ।

लेकिन, 

चुप एक होगा और हज़ारो तैयार, 

न हमारा कुछ बिगड़ेगा न जाएगा ,

बस होगी तो एक और जिन्दगी गुमनामी की ओर……..